मदारी पासी

अंगेजों के शासनकाल में, जमींदारी प्रथा थी और जमींदार लोग किसानों और व्यापारियों से मनमाना कर वसूल कर अंग्रेजों को देते थे। *मदारी पासी* एक साधारण किसान के पुत्र थे जिनका जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के ज़िला हरदोई, सण्डीला तहसील के ग्राम मोहन खेड़ा में वर्ष 1860 में हुआ था । उन्होंने उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर ज़िलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों को संगठित कर *'एका आन्दोलन'* के नाम से आन्दोलन चलाया। इस आंदोलन की प्रमुख बात यह थी कि, हम जबरजस्ती किसी के यहां मजदूरी नहीं करेंगें, बिना रसीद के लगान नहीं देंगें, हर हालात में संगठित रहेंगें। मदारी पासी जी के नेतृत्व में इस आंदोलन को बहुत बड़ा प्रतिसात मिला लोग इन्हें गरीबों के गांधी के नाम से सम्बोधित करने लगे। आम आदमी और शोषित वर्ग इन्हें मसीहा मानने लगे और इस तरह इनकी ताकत बढ़ने लगी। मदारी पासी जी की बढती लोकप्रियता और मजबूत होते संगठन की बदौलत अंग्रेजों को किसानों को लगान में भारी छूट देनी पड़ी।

"एका आंदोलन" की सफलता पर इन्हें *जननायक* के रुप में जाना जाने लगा। परंतु बहुत ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि, किसान क्रांति के जनक और किसानों के इस मसीहा को इतिहास में कहीं जगह नहीं मिली है।

अखिल भारतीय पासी विकास मंडल, पासी समाज के इस क्रांतिसूर्य को शत शत नमन करता है और आप सभी से भी निवेदन करता है कि किसानों के उद्धार व उनके सम्मान के लिए इनके द्वारा किये गए कार्यों को जन- जन तक जरूर पहुंचाए।